अमेरिका ने चीन की चुनौती का जवाब दिया: 12 अरब डॉलर के ‘प्रोजेक्ट वॉल्ट’ से बनाया जाएगा दुर्लभ खनिजों का ‘रणनीतिक गढ़’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐतिहासिक आर्थिक एवं रणनीतिक पहल की शुरुआत की है, जिसका मकसद देश को महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में आत्मनिर्भर बनाना और चीन पर निर्भरता कम करना है। ‘प्रोजेक्ट वॉल्ट’ नामक इस योजना के तहत 12 अरब डॉलर (लगभग 1.08 लाख करोड़ रुपये) की लागत से एक ऐसा रणनीतिक भंडार तैयार किया जाएगा, जो अमेरिकी उद्योगों को दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।
इसे अमेरिकी इतिहास में पहली बार निजी उद्योगों के लिए बनाया जाने वाला ऐसा महत्वपूर्ण खनिज भंडार बताया जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने इसकी घोषणा करते हुए कहा, “सालों से, बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान अमेरिकी व्यवसायों को महत्वपूर्ण खनिजों की कमी का सामना करना पड़ा है। ‘प्रोजेक्ट वॉल्ट’ यह सुनिश्चित करेगा कि अमेरिकी कंपनियों और कर्मचारियों को किसी भी कमी से कभी नुकसान न हो”।
प्रोजेक्ट वॉल्ट: एक सरंक्षित भविष्य की कुंजी
इस परियोजना को एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के रूप में डिजाइन किया गया है। इसका मूल उद्देश्य ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, ऑटोमोटिव और हाई-टेक उत्पादों के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना है।
मुख्य बिंदु:
· उद्देश्य: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, कीमतों में उतार-चढ़ाव या किसी एक देश (खासकर चीन) पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम से अमेरिकी उद्योग को बचाना।
· भंडारण: देश भर में स्थापित सुविधाओं में लिथियम, कोबाल्ट, गैलियम और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों जैसे खनिजों का स्टॉक किया जाएगा।
· लक्ष्य: 60-दिवसीय आपातकालीन आपूर्ति का रणनीतिक भंडार तैयार करना।
वित्तपोषण और प्रमुख भागीदार
यह परियोजना सरकारी संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच सहयोग का एक बेहतरीन उदाहरण है।
वित्तपोषण संरचना:
· अमेरिकी एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक (EXIM): 10 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष ऋण।
· निजी पूंजी: 2 अरब डॉलर (इसमें से 1.67 अरब डॉलर प्रारंभिक निजी निवेश है)।
शामिल प्रमुख कंपनियां:
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में दर्जन भर से अधिक बड़ी वैश्विक कंपनियां शामिल हैं, जो इसके व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
· बोइंग, जनरल मोटर्स, स्टेलेंटिस (ऑटोमोटिव एवं एयरोस्पेस)
· जीई वर्नोवा, वेस्टर्न डिजिटल (ऊर्जा एवं प्रौद्योगिकी)
· कॉर्निंग (विनिर्माण)
· खनिज आपूर्तिकर्ता: हार्ट्री पार्टनर्स, मर्कुरिया एनर्जी और ट्रैक्सिस जैसी कमोडिटी ट्रेडिंग फर्म भंडार के लिए कच्चे माल की खरीद संभालेंगी।
एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक के अध्यक्ष जॉन जोवानोविक ने कहा कि इस परियोजना से अमेरिकी करदाताओं को भी लाभ होगा, क्योंकि ऋण पर मिलने वाला ब्याज आय का एक स्रोत बनेगा।
चीन के वर्चस्व को चुनौती: ‘आर्थिक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा’
विश्लेषकों का मानना है कि प्रोजेक्ट वॉल्ट के पीछे सबसे बड़ा राजनीतिक-रणनीतिक कारण चीन पर निर्भरता कम करना है। दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के वैश्विक उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात में चीन का दबदबा है। हाल के वर्षों में चीन द्वारा कुछ खनिजों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की घटनाओं ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को हिलाकर रख दिया था।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने इसी चिंता को व्यक्त करते हुए कहा, “आर्थिक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है… अगर हमारे पास महत्वपूर्ण खनिजों पर नियंत्रण नहीं होगा, तो देश की संप्रभुता अधूरी है”।
यह प्रणाली कैसे काम करेगी?
प्रोजेक्ट वॉल्ट का ऑपरेटिंग मॉडल अमेरिकी स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व जैसा ही है, लेकिन इसमें खनिज शामिल होंगे।
1. प्रतिबद्धता: निर्माता कंपनियां भविष्य में एक तय कीमत पर खनिज खरीदने की प्रारंभिक प्रतिबद्धता जताएंगी।
2. खरीद एवं भंडारण: प्रोजेक्ट वॉल्ट इन जरूरतों के आधार पर खनिजों की बड़े पैमाने पर खरीदारी करेगा और उन्हें सुरक्षित भंडारण सुविधाओं में रखेगा।
3. पहुंच: कंपनियां भंडारित खनिजों तक पहुंच सकती हैं, लेकिन बाद में उन्हें उतनी ही मात्रा फिर से भरनी होगी। बड़े आपूर्ति संकट की स्थिति में, कंपनियां अपने पूरे आरक्षित स्टॉक तक पहुंच बना सकेंगी।
4. लागत: कंपनियां केवल भंडारण और ऋण ब्याज से जुड़ी लागत वहन करेंगी, जिससे उनकी बैलेंस शीट पर भारी मात्र में खनिज स्टॉक रखने का दबाव कम होगा।
वैश्विक प्रभाव और भारत के लिए संदर्भ
अमेरिका का यह कदम वैश्विक व्यापार और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के नए युग की शुरुआत का संकेत देता है।
· यूरोप/यूक्रेन संकट से सबक: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ऊर्जा और निकल जैसी धातुओं की कीमतों में आई भारी उछाल ने पश्चिमी देशों को आपूर्ति श्रृंखला के जोखिम के प्रति सचेत किया था।
· भारत के लिए अवसर: भारत जैसे विकासशील देश, जो स्वयं अपनी विनिर्माण क्षमता बढ़ाने और हरित ऊर्जा (जैसे इलेक्ट्रिक वाहन) में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, इस योजना से दो महत्वपूर्ण सबक ले सकते हैं। पहला, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संसाधनों के लिए आत्मनिर्भरता का महत्व। दूसरा, निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के सहयोग से बड़े बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट को अंजाम देना।
· नई वैश्विक गठजोड़: अमेरिका पहले ही ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे मित्र देशों के साथ खनिज सहयोग समझौते कर चुका है। प्रोजेक्ट वॉल्ट की घोषणा के साथ ही, ट्रंप प्रशासन ने बताया कि इस सप्ताह 11 और देश एक वैश्विक गठबंधन में शामिल होंगे।
निष्कर्ष:
प्रोजेक्ट वॉल्ट सिर्फ एक आर्थिक योजना नहीं, बल्कि 21वीं सदी में अमेरिकी तकनीकी और रणनीतिक वर्चस्व को बनाए रखने का एक बड़ा हथियार है। यह दर्शाता है कि अब महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य शस्त्रागार तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उन दुर्लभ खनिजों तक पहुंच पर भी निर्भर है, जो आधुनिक तकनीक की रीढ़ हैं। इस पहल का असर न केवल अमेरिका और चीन, बल्कि भारत सहित दुनिया के अन्य देशों की औद्योगिक एवं व्यापार नीतियों पर भी पड़ेगा.
Author: ainewsworld