गोवर्धन पूजा पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

गोवर्धन पूजा का त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इसका धार्मिक महत्व भगवान कृष्ण की उस लीला से जुड़ा है, जब उन्होंने इंद्र के क्रोध से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। इस घटना के बाद से ही लोग प्रकृति की शक्ति का आदर करते हुए गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा करने लगे।

‘अन्नकूट’ नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि इस दिन विशेष रूप से तैयार किए गए अन्न (खाद्य पदार्थों) के भव्य और सुंदर पहाड़ (कूट) को भगवान को अर्पित किया जाता है। इस प्रसाद में दाल, चावल, सब्जियों, मेवों और मिष्ठान्नों से बनी 56 या 108 प्रकार की व्यंजनों की एक समृद्ध विविधता शामिल होती है, जिसे ‘छप्पन भोग’ या ‘अन्नकूट’ कहा जाता है।

कैसे मनाई जाती है गोवर्धन पूजा?

आज सुबह से ही देश भर के घर-घर में उत्साह का माहौल देखने को मिल रहा है। मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया गया है। पूजा की मुख्य रस्मों में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्रण करना या उसकी प्रतिमा बनाना शामिल है। इसके बाद परिवार के सदस्य इसकी परिक्रमा करते हैं और दीप जलाकर, फल, फूल और अन्नकूट अर्पित करके अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

गायों को इस दिन विशेष सम्मान दिया जाता है। उन्हें स्नान कराकर, सिंदूर और फूलों से सजाया जाता है तथा उनके लिए विशेष भोजन का प्रबंध किया जाता है। यह प्रथा कृषि प्रधान भारतीय समाज में पशुधन के महत्व को दर्शाती है।

प्रकृति प्रेम का संदेश

गोवर्धन पूजा का सबसे गहरा संदेश प्रकृति के साथ सहअस्तित्व और उसके प्रति आभार का है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि पहाड़, नदियाँ, भूमि और पशु हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं और इनके बिना हमारा अस्तित्व संभव नहीं है। अन्नकूट का भोग पर्यावरण और जीवनदायिनी शक्तियों के प्रति हमारी कृतज्ञता का एक सुंदर प्रतीक है।

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Author: ainewsworld

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