बांग्लादेश में अगले साल 12 फरवरी को प्रस्तावित संसदीय चुनाव की तैयारियों के बीच, अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरी है। देश के प्रमुख अल्पसंख्यक संगठन ‘बांग्लादेश हिंदू-बौद्ध-ईसाई एकता परिषद’ ने सभी राजनीतिक दलों से अपने चुनावी घोषणा-पत्र में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का वादा शामिल करने का सीधा आग्रह किया है।
परिषद ने अपनी मांग को ठोस आंकड़ों के साथ रखते हुए चौंकाने वाला खुलासा किया। संगठन के अनुसार, पिछले 11 महीनों में देशभर में अल्पसंख्यकों पर 2,673 से अधिक हमले दर्ज किए गए, जिनमें 90 लोगों की मौत हो गई। यह आंकड़ा चुनावी मौसम से पहले अल्पसंख्यक समुदायों के बीच व्याप्त डर और असुरक्षा की भावना को उजागर करता है।
इस आग्रह का संदर्भ बांग्लादेश की तेजी से बदलती राजनीतिक पृष्ठभूमि है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान के लंबे निर्वासन के बाद देश लौटने से राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनाव में दलों का अल्पसंख्यक अधिकारों के प्रति रुख न केवल चुनावी नतीजों, बल्कि पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए भी अहम होगा।
अल्पसंख्यक समुदायों की ओर से चिंता जताई जा रही है कि चुनावी माहौल में धमकियों और हिंसा के चलते वे मतदान केंद्र तक जाने से भी हिचकिचा सकते हैं, जिससे उनके मतदान के अधिकार पर ही प्रश्नचिह्न लग सकता है। हाल में मयमनसिंह में एक हिंदू युवक की निर्मम हत्या जैसी घटनाओं ने इस डर को और गहरा कर दिया है।
एकता परिषद ने सरकार और चुनाव आयोग से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है, यह चेतावनी देते हुए कि ऐसा न होने पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ेगा। इस मांग के साथ ही, विविधता आयोग के गठन और भेदभाव विरोधी कानून को तत्काल लागू करने की मांग भी उठ रही है।
स्पष्ट है कि बांग्लादेश में अगले साल होने वाले चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का मामला नहीं हैं, बल्कि वे देश के लोकतांत्रिक ढांचे और उसकी बहुलवादी सामाजिक संरचना की परीक्षा का समय भी होंगे। अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का वादा अब एक नैतिक जिम्मेदारी से आगे बढ़कर एक महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बन गया है।
Author: ainewsworld