अरावली पर्वतमाला: सदियों से देश की रक्षा करती प्राचीन प्राकृतिक दीवार पर मंडराता नया खतरा

सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले ने उत्तर भारत के “ग्रीन लंग्स” की परिभाषा बदल दी है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि नियमों में ढील से 1.18 लाख पहाड़ियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है, जिसका सीधा असर 5 करोड़ लोगों के जीवन पर पड़ेगा।

दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक, भारत की अरावली पर्वतमाला आज एक बार फिर देश के सामने एक बड़े पारिस्थितिकी संकट के केंद्र में है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने अरावली की परिभाषा और उसके संरक्षण के दायरे को बदलकर रख दिया है, जिससे पर्यावरणविदों के बीच गहरी चिंता पैदा हो गई है।

यह पर्वत श्रृंखला, जिसकी उम्र लगभग 25 से 32 अरब वर्ष आंकी जाती है, न सिर्फ एक भूवैज्ञानिक धरोहर है, बल्कि थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार भी है।

अरावली का भौगोलिक विस्तार और ऐतिहासिक महत्व

अरावली पर्वतमाला गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर दिल्ली तक फैली है और इसकी कुल लंबाई लगभग 650 से 800 किलोमीटर के बीच है। इसका 80% से अधिक भाग राजस्थान में पड़ता है।

प्रमुख भौगोलिक तथ्य:

· उच्चतम शिखर: गुरु शिखर (1,722 मीटर), राजस्थान के सिरोही जिले के माउंट आबू में स्थित।
· दिशा: उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर।
· प्रमुख नदियों का उद्गम: बनास, लूनी, साबरमती और साखी जैसी नदियों का स्रोत।

एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र: पौधे, जीव और मानव

अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि एक समृद्ध जैव विविधता वाला क्षेत्र है।

· वन्य जीवन: यहाँ तेंदुआ, स्लॉथ बियर, नीलगाय और लकड़बग्घा जैसे स्तनधारी पाए जाते हैं। 300 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ और सैकड़ों की संख्या में सरीसृप भी यहाँ का घर हैं।
· वनस्पति: इस क्षेत्र में 200 से अधिक पौधों की प्रजातियाँ दर्ज हैं, जिनमें धोक, बबूल, नीम जैसे पेड़ और कई औषधीय पौधे शामिल हैं।
· मानव निर्भरता: चार राज्यों (गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली) के लगभग 29 जिलों में फैले इस क्षेत्र की लगभग 5 करोड़ आबादी अपने जलवायु संतुलन, पानी और आजीविका के लिए अरावली पर निर्भर है।

वर्तमान विवाद: 100 मीटर का मानदंड और बड़ा खतरा

नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा तय करने के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी।

नए नियम के मुख्य बिंदु:

· स्थानीय भूभाग से कम से कम 100 मीटर ऊँची पहाड़ियों को ही “अरावली पहाड़ी” माना जाएगा।
· यदि ऐसी दो पहाड़ियाँ एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हों, तो उनके बीच का क्षेत्र भी “अरावली पर्वतमाला” का हिस्सा माना जाएगा और खनन के लिए प्रतिबंधित रहेगा।

विवाद और चिंताएँ:
सरकार काकहना है कि इससे 90% क्षेत्र का संरक्षण सुनिश्चित होगा। हालाँकि, पर्यावरणविदों और वन विशेषज्ञों ने गहरी चिंता जताई है।

· भारतीय वन सर्वेक्षण के आँकड़ों के अनुसार, राजस्थान के 15 जिलों में दर्ज 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 (मात्र 8.7%) ही 100 मीटर के इस मानदंड पर खरी उतरती हैं।
· विशेषज्ञों का मानना है कि इस परिभाषा के कारण 1.18 लाख से अधिक छोटी पहाड़ियाँ संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएँगी और उन पर खनन व निर्माण का खतरा मंडराने लगेगा।
· विशेषज्ञों का तर्क है कि 40 मीटर ऊँची पहाड़ी भी मरुस्थलीकरण को रोकने और जल संचय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

दिल्ली और उत्तर भारत के लिए क्यों है अरावली जीवनरेखा ?

अरावली की पारिस्थितिक भूमिका को समझना ही इस पूरे विवाद को समझने की कुंजी है।

1. मरुस्थल रोकथाम की प्राकृतिक दीवार:
अरावलीथार मरुस्थल को हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उपजाऊ भूमि की ओर फैलने से रोकती है। इसके कमजोर होने से रेगिस्तान के पूर्व की ओर बढ़ने का खतरा है।

2. जलवायु नियामक और वर्षा स्रोत:
यह पर्वतमालामानसूनी हवाओं को रोककर ओरोग्राफिक वर्षा कराने में सहायक है। इसके कारण ही दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों में वर्षा का एक निश्चित स्तर बना रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली के नष्ट होने से इस क्षेत्र में 20-30% तक बारिश कम हो सकती है।

3. भूजल पुनर्भरण और जल सुरक्षा:
अरावलीकी चट्टानें वर्षा के जल को सोखकर भूजल स्तर को रिचार्ज करने का काम करती हैं। यह क्षमता आसपास के मैदानी इलाकों से 3-4 गुना अधिक है। दिल्ली जैसे शहर की बसावट के लिए ऐतिहासिक रूप से यमुना नदी और अरावली के जंगल ही दो मुख्य कारण थे।

4. ग्रीन लंग्स और धूल नियंत्रण:
दिल्लीएनसीआर के लिए अरावली ग्रीन लंग्स (हरित फेफड़े) का काम करती है और धूल भरी आंधियों से शहर की रक्षा करती है।

संरक्षण के प्रयास और चुनौतियाँ

अरावली को बचाने के लिए कई प्रयास चल रहे हैं। सरिस्का टाइगर रिजर्व, असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य और अरावली जैव विविधता पार्क जैसे क्षेत्र संरक्षण के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस क्षेत्र में अनियंत्रित खनन को “देश की पारिस्थितिकी के लिए एक बड़ा खतरा” बताया है।

हालाँकि, अवैध खनन, शहरी अतिक्रमण और अब नई परिभाषा से उत्पन्न चिंताएँ इस प्राचीन धरोहर के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रही हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. सना रहमान जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि केवल 100 मीटर का मानदंड पारिस्थितिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं है, क्योंकि अरावली में पहाड़ियों के साथ-साथ उनकी घाटियाँ और तालाब भी महत्वपूर्ण पारिस्थितिक इकाइयाँ हैं।

इस विवाद का नतीजा न सिर्फ लाखों पहाड़ियों के भविष्य, बल्कि उत्तर भारत के जलवायु संतुलन, जल सुरक्षा और करोड़ों लोगों के जीवन को तय करेगा। यह सवाल सिर्फ एक पर्वतमाला का नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक रहने लायक पर्यावरण देने का है।

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Author: ainewsworld

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