
भारत की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला अरावली (Aravalli Range) को लेकर हाल के दिनों में देश भर में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यह मामला सिर्फ पर्यावरण का नहीं रहा, बल्कि कानून, राजनीति और सामाजिक आंदोलनों तक फैल चुका है।
अरावली पर्वतमाला — क्यों है खास?
अरावली पर्वत श्रृंखला पश्चिमी भारत के दिल्ली-एनसीआर से होते हुए राजस्थान, हरियाणा और गुजरात तक लगभग 670 किमी लम्बी फैली हुई है। यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में से एक है और इसकी उम्र अरबों साल बताई जाती है।
अरावली का पारिस्थितिक महत्व अत्यंत व्यापक है:
✔️ यह भूजल रिचार्ज का मुख्य स्रोत है
✔️ रेगिस्तान के फैलाव को रोकता है
✔️ नदियों व नदीनालों को पानी देता है
✔️ हवा की गुणवत्तá और हरियाली बनाए रखता है
✔️ जैव विविधता और वन्य जीवन को सुरक्षित करता है
विवाद की शुरुआत — 100-मीटर नियम
माना जा रहा विवाद का मूल केंद्र है एक नई “परिभाषा”, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश पर स्वीकार किया है। इसके अनुसार:
अब केवल वही पहाड़ियां या चोटियाँ “अरावली” मानी जाएँगी जो अपने आसपास के सामान्य धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची होंगी।
इस नए मानक के लागू होने से विशेषज्ञों का कहना है कि:
🔹 अरावली की लगभग 90% छोटी-मोटी पहाड़ियाँ इस नई परिभाषा में नहीं आएँगी।
🔹 इससे वे कानूनी सुरक्षा से बाहर हो सकती हैं।
🔹 खनन, निर्माण और वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए संशय पैदा हो गया है।
🌱 पर्यावरणीय चिंताएँ

पर्यावरणविद, वैज्ञानिक और स्थानीय समुदायों का मानना है कि:
❗ छोटी ऊँचाई की चोटियाँ भी भूजल रिचार्ज, मिट्टी को रोकने और धूल-तूफानों को कम करने में अहम भूमिका निभाती हैं।
❗ अगर यह हिस्सा संरक्षण से बाहर हुआ तो दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में जल संकट और रेगिस्तानीकरण की समस्या गंभीर हो सकती है।
इसी आधार पर सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान भी जोरों पर है, जिसमें नागरिकों से लेकर आंदोलनों तक पर्यावरण सुरक्षा की अपील की जा रही है।
विरोध और प्रदर्शन
राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर सहित कई स्थानों पर लोग सड़कों पर उतर आए हैं।
पर्यावरण संगठनों, शोधकर्ताओं और सामाजिक समूहों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह निर्णय अरावली के पारिस्थितिक तंत्र को कमजोर करेगा।
प्रदर्शनों में “Save Aravalli, Save Future” जैसे नारे लगाए गए हैं और पहाड़ियों को एकीकृत संरक्षण क्षेत्र घोषित करने की मांग की जा रही है।
सरकार का पक्ष
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस और मीडिया बयानों में कहा है कि:
✔️ नई परिभाषा से अरावली की सुरक्षा कमजोर नहीं हो रही है।
✔️ केंद्र सरकार का लक्ष्य संरक्षण और सतत विकास को संतुलित करना है।
✔️ “100-मीटर नियम” के बावजूद कोर पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील इलाकों में रात्रि माइनिंग नहीं होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मीडिया चैनलों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा है और अधिकांश हिस्सा पहले से ही संरक्षित है।
राजनीतिक बहस और सामाजिक प्रभाव
यह विवाद अब राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है। राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों के नेताओं ने बयान दिए हैं, कुछ ने समीक्षा याचिका दायर करने की बात कही है और सियासी बहस तेज हो गई है।
स्थानीय जनजातीय समुदायों ने भी इस मामले में अपनी भूमिका तय करते हुए अरावली की रक्षा के लिए प्रतिबद्धता जताई है, क्योंकि उनका पारंपरिक जीवन और सांस्कृतिक धरोहर भी सीधे-सीधे खतरे में है।
आगे क्या होने वाला है?
विशेषज्ञों के अनुसार:
🔸 संसद, सुप्रीम कोर्ट या केंद्र सरकार द्वारा इस पर घरेलू नीति-निर्माण हो सकता है।
🔸 स्थानीय प्रशासनों द्वारा जमीनी निगरानी और संरक्षण तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।
🔸 यदि संरक्षण कार्य प्रभावी रूप से लागू नहीं हुआ, तो यह क्षेत्रीय जल और पर्यावरण संकट को और गहरा कर सकता है।
अरावली सिर्फ एक पर्वत शृंखला नहीं है — यह उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिक रीढ़ है।
आज का विवाद विकास और पर्यावरण सुरक्षा के बीच के जटिल संतुलन को बयान करता है। दोनों पक्षों के तर्क, चिंताएँ और प्रस्ताव हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस मामले का प्रभाव दिल्ली-एनसीआर से लेकर राजस्थान और गुजरात तक महसूस किया जाएगा।
Author: ainewsworld