
पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा आपातकालीन तेल भंडार जारी करने का ऐतिहासिक फैसला किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेरिस मुख्यालय वाली इस एजेंसी ने सदस्य देशों के रणनीतिक भंडारों से 40 करोड़ बैरल कच्चा तेल बाजार में उपलब्ध कराने पर सहमति जताई है।
यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच तनातनी चरम पर है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होने वाली वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने फारस की खाड़ी में वाणिज्यिक जहाजों पर हमले कर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल निर्यात लाइन को लगभग ठप कर दिया है।
क्यों जरूरी हुआ यह कदम?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। IEA ने क्षेत्रीय अस्थिरता और आपूर्ति बाधित होने की आशंका के मद्देनजर यह कदम उठाया है। एजेंसी के पास वर्तमान में सदस्य देशों का 1.2 अरब बैरल से अधिक सार्वजनिक आपातकालीन तेल भंडार मौजूद है। इसके अलावा, लगभग 6 करोड़ बैरल औद्योगिक भंडार भी उपलब्ध है, जिसका उपयोग आवश्यकता पड़ने पर किया जा सकता है।
वैश्विक प्रतिक्रिया और प्रभाव
इस फैसले से सबसे ज्यादा फायदा तेल आयातक देशों को होगा, जिनमें भारत, अमेरिका और यूरोपीय देश शामिल हैं। IEA के अनुरोध के बाद जर्मनी और ऑस्ट्रिया ने पहले ही अपने रणनीतिक भंडार का कुछ हिस्सा जारी करने की पुष्टि कर दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस ऐतिहासिक फैसले से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी, जो हाल के दिनों में ईरान-इजराइल तनाव और चीन-रूस के बीच बढ़ते ऊर्जा समीकरणों के चलते आसमान छू रही थीं।
भारत और अन्य देशों पर पड़ने वाला असर
भारत जैसे विकासशील देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, उसके लिए यह राहत भरी खबर है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और अबू धाबी जैसे खाड़ी देश भी इस क्षेत्रीय तनाव पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा सीधे तौर पर उनके अर्थशास्त्र से जुड़ी है।
IEA का यह कदम न सिर्फ पश्चिम एशिया में बल्कि अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे प्रमुख देशों की ऊर्जा नीतियों को भी प्रभावित करेगा। फिलहाल सभी की निगाहें तेल की कीमतों और इस क्षेत्र में जारी भू-राजनीतिक हलचल पर टिकी हैं।
Author: ainewsworld