भारत-अमेरिका ऐतिहासिक व्यापार समझौता: वस्त्र उद्योग को बड़ी राहत, 2030 तक 100 अरब डॉलर निर्यात का लक्ष्य

भारत-अमेरिका वस्त्र समझौता: 18% टैरिफ में कमी, निर्यातकों को बड़ा फायदा, रोजगार के अवसर

भारत और अमेरिका के बीच हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते से वस्त्र उद्योग को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा। 18% टैरिफ कमी से भारतीय निर्यातकों को बांग्लादेश, चीन जैसे देशों पर बढ़त। जानें कैसे यह समझौता 2030 तक 100 अरब डॉलर निर्यात लक्ष्य हासिल करने में मददगार साबित होगा।

“भारत-अमेरिका व्यापार डील से वस्त्र क्षेत्र में मिली नई उड़ान! जानिए कैसे बदलेगी वैश्विक सोर्सिंग की तस्वीर और कैसे बनेगा भारत ‘वस्त्र निर्यात का हब’। #IndiaUSTradeDeal #TextileIndustry”

नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते ने दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। विशेष रूप से भारतीय वस्त्र और परिधान उद्योग के लिए यह सौदा एक ‘गेम चेंजर’ साबित होने वाला है। केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय ने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे द्विपक्षीय वस्त्र व्यापार के लिए एक प्रमुख उत्प्रेरक बताया है। इसकी गूंज अब वैश्विक व्यापार मंचों पर सुनाई दे रही है।

118 अरब डॉलर के अमेरिकी बाजार का द्वार खुला

इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह भारतीय वस्त्र निर्यातकों के लिए अमेरिका के 118 अरब डॉलर के विशाल वैश्विक आयात बाजार के द्वार खोलता है। इस बाजार में वस्त्र, परिधान और तैयार उत्पाद शामिल हैं। ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका पहले से ही भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, जहां वस्त्र निर्यात की मात्रा लगभग 10.5 अरब डॉलर है। इसमें करीब 70% परिधान और 15% तैयार उत्पाद शामिल हैं। नए समझौते से इस मात्रा में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है।

2030 तक 100 अरब डॉलर निर्यात लक्ष्य को मिलेगी गति

भारत सरकार ने वस्त्र क्षेत्र के निर्यात का लक्ष्य 2030 तक 100 अरब डॉलर निर्धारित किया है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अनुमान है कि अमेरिका अकेले इस लक्ष्य का पांचवां हिस्सा (20% से अधिक) पूरा करने में योगदान दे सकता है। समझौते से मिलने वाली गति से निर्यात को नया बढ़ावा मिलेगा।

18% टैरिफ कमी से मिली प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त

इस डील का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वस्त्र उत्पादों, परिधानों और तैयार माल पर 18% की पारस्परिक टैरिफ (शुल्क) में कमी है। यह कदम न केवल पहले के शुल्क ढांचे से होने वाले नुकसान की भरपाई करेगा, बल्कि भारतीय निर्यातकों को अन्य प्रमुख प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर स्थिति में ला देगा।

· बांग्लादेश: 20% शुल्क
· चीन: 30% शुल्क
· पाकिस्तान: 19% शुल्क
· वियतनाम: 20% शुल्क

इन देशों की तुलना में भारत को मिली टैरिफ राहत से वैश्विक बाजार की गतिशीलता बदलने की उम्मीद है। अमेरिका के बड़े खरीदार और ब्रांड अब अपनी सोर्सिंग रणनीति पर पुनर्विचार करते हुए भारत को एक आकर्षक और लागत-प्रभावी विकल्प के रूप में देखेंगे।

निवेश बढ़ेगा, रोजगार के अवसर पैदा होंगे

यह समझौता केवल निर्यात तक सीमित नहीं है। इससे वस्त्र क्षेत्र की आपूर्ति श्रृंखला भी मजबूत होगी। अब भारतीय कंपनियों के लिए कच्चा माल और इंटरमीडिएट उत्पाद अमेरिका से सोर्स करना आसान होगा, जिससे जोखिम कम होंगे और लागत प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। इससे देश में उच्च मूल्य वर्धित वस्त्रों के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा और उत्पादन में विविधता आएगी। नतीजतन, इस क्षेत्र में नए रोजगार सृजित होंगे और अमेरिकी कंपनियों द्वारा भारत में प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को प्रोत्साहन मिलेगा।

वैश्विक प्रभाव: अमेरिका, यूरोप एवं अन्य देशों पर असर

यह समझौता भारत और अमेरिका के अलावा अन्य अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म जैसे यूरोपीय संघ, यूक्रेन, रूस और अन्य देशों के लिए भी संकेतक है। यह दर्शाता है कि भारत वैश्विक व्यापार में एक विश्वसनीय और रणनीतिक भागीदार के रूप में उभर रहा है। दुनिया भर के व्यापार विश्लेषक इस डील को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं। चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिशों के बीच, भारत अब वैश्विक वस्त्र बाजार में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है।

निष्कर्ष: भारत-अमेरिका वस्त्र व्यापार समझौता ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक मजबूत कदम है। यह न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देगा, बल्कि वैश्विक व्यापार के नक्शे में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा। उद्योग के हितधारकों को उम्मीद है कि इससे मिलने वाला बढ़ावा देश को एक बार फिर से ‘वस्त्रों की भूमि’ के रूप में वैश्विक पहचान दिलाएगा।

ainewsworld
Author: ainewsworld

यह भी पढ़ें

टॉप स्टोरीज