सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल मतदाता सूची SIR केस पर ईसी को नोटिस जारी किया, ममता बनर्जी पहुंचीं अदालत | Supreme Court West Bengal Voter List SIR केस
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल मतदाता सूची SIR मामले पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अदालत में आधार को प्रमुख दस्तावेज बनाने की मांग की। जानिए पूरी खबर। पश्चिम बंगाल चुनाव समाचार।
नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में चुनाव आयोग (ईसी) और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) को नोटिस जारी करते हुए 9 अगस्त तक अपना जवाब देने को कहा है। यह आदेश राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें उन्होंने मतदाता सूची एसआईआर प्रक्रिया में कथित हस्तक्षेप और विसंगतियों के खिलाफ राहत मांगी है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा भी शामिल थे, ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि बूथ स्तर के अधिकारी और मतदाता सूची अधिकारी मामूली विसंगतियों के आधार पर नोटिस जारी करते समय अधिक संवेदनशीलता और सतर्कता बरतें।
दिलचस्प बात यह रही कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता के रूप में पेश हुईं। उन्होंने अदालत से पांच मिनट का समय अपनी बात रखने के लिए मांगा, जिस पर मुख्य न्यायाधीश ने उदारता दिखाते हुए कहा, “हम आपको पांच नहीं, बल्कि 15 मिनट देंगे।”
याचिका का मूल मुद्दा क्या है?
ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को चुनौती दी है। उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया में मनमाने ढंग से कई वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं, खासकर उन लोगों के, जिनके पास आधार कार्ड ही पहचान का प्राथमिक दस्तावेज है।
उनकी मुख्य मांग है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह आधार कार्ड को पहचान के पर्याप्त प्रमाण के रूप में स्वीकार करे और अन्य दस्तावेजों की अनिवार्यता पर जोर न दे। उन्होंने आयोग पर राजनीतिक पूर्वाग्रह का भी आरोप लगाया है।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने इन आरोपों का खंडन किया। उन्होंने अदालत को बताया कि एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने स्वयं 80 ग्रेड-टू अधिकारियों की सेवाएं प्रदान की थीं। इससे आयोग का पक्ष मजबूत होता है कि प्रक्रिया पारदर्शी और राज्य सरकार के सहयोग से चल रही है।
राजनीतिक और संवैधानिक महत्व
यह मामला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया से कहीं आगे जाकर लोकतंत्र की बुनियाद – मतदाता सूची की शुद्धता और निष्पक्षता – से जुड़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल, जहां राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता तीव्र है, वहां मतदाता सूची हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
आगे की कार्यवाई
सर्वोच्च न्यायालय ने अब चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से 9 अगस्त तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई होगी। इस फैसले का पश्चिम बंगाल की राजनीति और भविष्य के चुनावी दौर पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।यह मामला देश के हर नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ा है और यह सुनिश्चित करता है कि चुनावी सुधारों को लागू करने में किसी वैध मतदाता का अधिकार छीना न जाए।
Author: ainewsworld