
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “हमारे भू-भाग का लगभग 60% हिस्सा समुद्र में है, फिर भी मूल्य सृजन में इसका योगदान अब तक सीमित रहा है। 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें भूमि-आधारित संसाधनों से आगे देखना होगा।”
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि नीली अर्थव्यवस्था भारत के भविष्य के विकास का नया प्रमुख इंजन बनने की क्षमता रखती है। भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएसएफ) में एक सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने देश की 11,000 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा और 23.7 लाख वर्ग किमी से अधिक के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) को एक विशाल अप्रयुक्त राष्ट्रीय संपत्ति बताया।
मंत्री ने जोर देकर कहा कि महासागरों की आर्थिक एवं वैज्ञानिक संभावनाओं का व्यवस्थित दोहन शुरू करने का समय आ गया है, क्योंकि यह देश की ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आवश्यकताओं और रणनीतिक शक्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
‘डीप ओशन मिशन’ निभाएगा केंद्रीय भूमिका
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि डीप ओशन मिशन (गहरा सागर अभियान) भारत की महासागर-संबंधी अनुसंधान एवं आर्थिक गतिविधियों को संस्थागत रूप देने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि महासागरों में मूल्यवान खनिज, धातु, जैव विविधता और मत्स्य संसाधनों का भंडार है, जो देश के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में भी योगदान दे सकते हैं।
समुद्र से मिलेगी स्वच्छ ऊर्जा
मंत्री ने नीली अर्थव्यवस्था के तहत नवीकरणीय ऊर्जा के विभिन्न विकल्पों की ओर ध्यान आकर्षित किया, जिनमें शामिल हैं:
· ऑफशोर पवन ऊर्जा (तट से दूर पवन ऊर्जा)
· महासागर आधारित सौर ऊर्जा
· ज्वारीय और लहर ऊर्जा
· सागरीय तापीय ऊर्जा (समुद्र के पानी में तापमान अंतर से)
· लवणीय प्रवणता ऊर्जा
समुद्री संसाधनों से खुलेंगे नए आर्थिक रास्ते
डॉ. सिंह ने कहा कि समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग बदलते वैश्विक क्रम में भारत की भू-राजनीतिक स्थिति को मजबूत करेगा। उन्होंने निम्नलिखित क्षेत्रों में नए आर्थिक अवसरों की संभावना व्यक्त की:
· समुद्री परिवहन एवं रसद
· गहरे समुद्र में खनन
· समुद्री जैव प्रौद्योगिकी
· समुद्री जैव विविधता से नई औषधियों की खोज
विकास के साथ चुनौतियों से निपटने की तैयारी
मंत्री ने नीली अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए आने वाली चुनौतियों की ओर भी इशारा किया। इनमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरे जैसे तटीय कटाव, समुद्री उष्ण लहरें और चक्रवात, तथा गैर-जलवायु संबंधी समस्याएं जैसे समुद्री प्लास्टिक कचरा और प्रदूषण शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रभावी संसाधन मानचित्रण, उन्नत तकनीक के उपयोग और निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी आवश्यक है। सत्र में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों ने सरकार, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच समन्वित कार्यवाही पर जोर दिया।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने अपना वक्तव्य समाप्त करते हुए समुद्री संसाधनों के जिम्मेदारीपूर्ण दोहन के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि नीली अर्थव्यवस्था पर आज लिए गए निर्णय भारत के आर्थिक एवं पारिस्थितिक भविष्य को आकार देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत @2047 के सपने को साकार करने में नीली अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रही है।
Author: ainewsworld